सोमवार, 28 जुलाई 2014

अंजनहारी (गुहेरी )-




अंजनहारी (गुहेरी )- 

आँखों की दोनों पलकों के किनारों पर बालों (बरौनियों) की जड़ों में जो छोटी-छोटी फुंसियां निकलती हैं,उसे ही अंजनहारी,गुहेरी या नरसराय भी कहा जाता है | कभी-कभी तो यह मवाद के रूप में बहकर निकल जाती है पर कभी-कभी बहुत ज़्यादा दर्द देती है और एक के बाद एक निकलती रहती हैं | चिकित्सकों के अनुसार विटामिन A और D की कमी से अंजनहारी निकलती है | कभी-कभी कब्ज से पीड़ित रहने कारण भी अंजनहारी निकल सकती हैं |


रविवार, 27 जुलाई 2014

What is The Proper Time 2 Have a BREAKFAST,LUNCH&DINNER.Must Watch And Never Get ILL BY BHAI Rajiv Dixit Ji

सभी जीव जन्तुओ की जठराग्नि सुबह सूरज निकलने के ढाई घंटे तक सबसे ज्यादा तीव्र रहती है और ये ही सही वक़्त होता है सबसे ज्यादा भोजन ग्रहण करने का |
अपने आप को पेट से सम्बन्धी सभी रोगों से अगर बचाना चाहते हो तो अपने खाने पीने का समय निर्धारित करे |

पहला सूत्र :
सुबह का भोजन सूरज निकलने के ढाई घंटे के भीतर समाप्त कर ले और इसमें आप के भोजन की मात्र सबसे ज्यादा होनी चाहिए |
दूसरा सूत्र :
दोपहर में सुबह से एक तिहाई कम भोजन ही करना चाहिए | कुछ भी ना खाए तो भी कोई नुक्सान नहीं होगा लेकिन आप कुछ भी हल्का जैसे कि फल आदि से दुपहर का भोजन का काम चला सकते है |
तीसरा सूत्र :
शाम के वक्त दोपहर से भी एक तिहाई कम भोजन करना चाहिए और उसको करने का सही समय है सूर्योदय से ४० मिनिट पहले तक आपका भोजन समाप्त हो जाना चाहिए |
चौथा सूत्र :
रात में वैसे तो कुछ नहीं खाना चाहिए , सिर्फ सोते समय दूध का सेवन लाभकारी रहता है |

इसी तरह पानी पीने के चार सूत्र है :
पहला सूत्र :
पानी सदा धीरे धीरे घूंट घूंट करके ही पीना चाहिए |
दूसरा सूत्र :
पानी सदा गुनगुना ही पीना चाहिए , ठंडा पानी पीना यानि वात रोगों को बुलावा देना है |
तीसरा सूत्र :
पानी खड़े होकर न पीये , बैठ कर पीये , इससे आप घुटने के दर्द से बचे रहेंगे |
चौथा सूत्र :
सुबह बिना कुल्ला किया पानी गुनगुना करके अवश्य ही पीना चाहिए |

What is The Proper Time 2 Have a BREAKFAST,LUNCH&DINNER.Must Watch And Never Get ILL BY BHAI RAJIV DIXIT JI

https://www.youtube.com/watch?v=TkJXNYHIWBg

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

प्राकृतिक दिनचर्या

प्राकृतिक दिनचर्या [भाग - १ ]
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प्रकृति हमारे जीवन का अभिन्न अंग है | हमें प्राकृतिक दिनचर्या का पालन करना चाहिये क्योंकि इसी से हम अपने आपको स्वस्थ एवं निरोगी रख सकते हैं | 
आज हम आपको प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धांतों से अवगत कराएंगे --
१-प्रतिदिन सूर्योदय से पहले उठना चाहिए । सुबह उठते समय बायीं करवट लेकर उठना चाहिए | 
२-उठने के बाद तांबे के बर्तन में रखा हुआ पानी , तीन-चार गिलास की मात्रा में बासी मुँह पीना चाहिए | सुबह के समय , खाली पेट ,चाय का सेवन नहीं करना चाहिए |
३-शौच के लिए जाने में किसी प्रकार का आलस्य नहीं करना चाहिए तथा शौच के समय दांतों को दबाकर रखना चाहिए , इससे हमारे दांत मजबूत होते हैं । सूर्य की ओर मुख करके मलमूत्र का त्याग नहीं करना चाहिए |
४-दांतों की सफ़ाई के लिए नीम की दातुन का प्रयोग करना चाहिए |
५-सुबह के समय हमें अवश्य ही टहलना चाहिए तथा प्राणायाम व आसन का अभ्यास भी अवश्य करना चाहिए |


प्राकृतिक दिनचर्या [भाग - २ ] [कल का शेष भाग]
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प्रकृति हमारे जीवन का अभिन्न अंग है | हमें प्राकृतिक दिनचर्या का पालन करना चाहिये क्योंकि इसी से हम अपने आपको स्वस्थ एवं निरोगी रख सकते हैं |
आज हम आपको प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धांतों से अवगत कराएंगे ----
१-स्नान करने से पहले १० मिनट के लिए शरीर की मालिश करनी चाहिए | यदि प्रतिदिन यह संभव न हो तो सप्ताह में एक दिन ऐसा अवश्य करें |
२- भूख लगने पर ही भोजन करना चाहिए तथा भूख से थोड़ा कम ही खाना चाहिए , इससे पाचन सम्बन्धी विकार नहीं होते हैं |
३-भोजन करने के बाद थोड़ी देर वज्रासन में अवश्य बैठना चाहिए | रात्रि के भोजन के पश्चात 10-15 मिनट अवश्य टहलना चाहिए |
४-स्वस्थ रहने के लिए प्रतिदिन अधिक से अधिक पानी पीना चाहिए | यदि हम प्रतिदिन चार - पांच तुलसी और नीम की पत्तियों का सेवन करें तो इससे शरीर में रोग नहीं होते हैं |
५-दिन में नहीं सोना चाहिए क्योंकि यह स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक होता है |
६- रात को सोने से पूर्व पैर धोकर सोने से नींद अच्छी आती है | हमेशा पश्चिम या उत्तर दिशा की ओर पैर करके ही सोना चाहिए अथवा पूर्व या दक्षिण दिशा की ओर सर करके ही सोना चाहिए | विशषकर विद्यार्धियों को पूर्व दिशा की ओर सर करके सोना चाहिए |



बेल का वृक्ष

बेल का वृक्ष बहुत प्राचीन है |
यह लगभग २०-३० फुट ऊंचा होता है | 
इसके पत्ते जुड़े हुए त्रिफाक और गंधयुक्त होते हैं | 
इसका फल ३-४ इंच व्यास का गोलाकार और पीले रंग का होता है | 
बीज कड़े और छोटे होते हैं | 
बेल के फल का गूदा और बीज एक उत्तम विरेचक (पेट साफ़ करने वाले ) माने जाते हैं | 
बेल शर्करा को कम करने वाला,कफ व वात को शांत करने वाला,अतिसार, मधुमेह,रक्तार्श,श्वेत प्रदर व अति रज : स्राव को नष्ट करने वाला होता है | 
आइए जानते हैं बेल के औषधीय गुण -


जामुन [ Jambul Tree ]

जामुन [ Jambul Tree ]

जामुन के सदाहरित वृक्ष जंगलों और सड़कों के किनारे सर्वत्र पाए जाते हैं | इसका पेड़ आम के पेड़ की तरह ही काफी बड़ा होता है | जामुन के पेड़ की छाल का रंग सफ़ेद-भूरा होता है | इसके पत्ते आम और मौलसिरी के पत्तों जैसे होते हैं | जामुन के फूल अप्रैल के महीने में लगते हैं और जुलाई से अगस्त तक जामुन पक जाते हैं | जामुन में लौह [ iron ] और phosphorus काफी मात्रा में होता है | 
जामुन मधुमेह , पथरी , लिवर ,तिल्ली और खून की गंदगी को दूर करता है | यह मूत्राशय में जमी पथरी को निकलता है | जामुन और उसके बीज पाचक और स्तम्भक होते हैं |
जामुन का विभिन्न रोगों में प्रयोग :-----
१- ३००- ५०० मिली ग्राम जामुन के सूखे बीज के चूर्ण को दिन में तीन बार लेने से मधुमेह में लाभ होता है |
२- जामुन के १० मि.ली. रस में २५० मिली ग्राम सेंधा नमक मिलाकर दिन में २-३ बार कुछ दिनों तक निरंतर पीने से मूत्राशयगत पथरी नष्ट होती है |
३- जामुन के १०-१५ मि.ली. रस में २ चम्मच मधु मिलाकर सेवन करने से पीलिया , खून की कमी तथा रक्त विकार में लाभ होता है |
४- जामुन के पत्तों की राख को दांतों और मसूढ़ों पर मलने से दाँत और मसूढ़े मजबूत होते हैं |
५- जामुन के ५-६ पत्तों को पीसकर लगाने से घाव में से पस बाहर निकल जाती है तथा घाव स्वच्छ हो जाते हैं ।
६- तंग जूतों से पाँव में जख्म हो गए हों तो जामुन की गुठली को पानी में पीसकर लगाने से लाभ होता है |
नोट :- जामुन का पका हुआ फल अधिक मात्र में सेवन करना हानिकारक हो सकता है , इसको नमक मिलाकर ही खाना चाहिए |

मलेरिया


मलेरिया एक वाहक-जनित संक्रामक रोग है जो प्रोटोज़ोआ परजीवी द्वारा फैलता है। मलेरिया सबसे प्रचलित संक्रामक रोगों में से एक है तथा भंयकर जन स्वास्थ्य समस्या है।मलेरिया के परजीवी का वाहक मादा एनोफ़िलेज़ (Anopheles) मच्छर है। इसके काटने पर मलेरिया के परजीवी लाल रक्त कोशिकाओं में प्रवेश कर के बहुगुणित होते हैं जिससे रक्तहीनता (एनीमिया) के लक्षण उभरते हैं (चक्कर आना, साँस फूलना, द्रुतनाड़ी इत्यादि) । इसके अलावा अविशिष्ट लक्षण जैसे कि बुखार, सर्दी, उबकाई, और जुखाम जैसी अनुभूति भी देखे जाते हैं। गंभीर मामलों में मरीज मूर्च्छा में जा सकता है और मृत्यु भी हो सकती है।

मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

दालचीनी

दालचीनी

जो दालचीनी, पतली, मुलायम चमकदार, सुगंधित और चबाने परतमतमाहट एवं मिठास उत्पन्न करने वाली हो, वह श्रेष्ठ होती है।दालचीनी की तासीर गर्म होती है।अत: गर्मी के मौसम में इसका कम से कम मात्रा में इस्तेमाल करना चाहिए। दालचीनी का सेवन लम्बे समय तक व लगातार मात्रा में नहीं करना चाहिए।वात-पित्त नाशक, मुंह का सूखना और प्यास को कम करने वाली होती है।दालचीनी की क्रिया श्वसन संस्थान पर अधिक होती है। यह कफ, जुकाम, क्षय (टी.बी) को नष्ट करती है। यह उत्तेजक, दर्दनाशक, स्नायु संस्थान में उत्तेजना लाने वाली,भूख बढ़ाने वाली, पाचक, अरुचि, उल्टी रोकने वाली, पेट के कीड़ों को नष्ट करने वाली, मल को गाढ़ा करने वाली, दस्त बंद करने वाली, बदबूनाशकतथा गैस निकालने वाली होती है। यह मूत्रवर्द्धक, हृदयशक्तिवर्द्ध क, यकृत, उत्तेजक तथा शरीर में स्फूर्ति लेने वाली होती है। यह त्वचा को निखारतीहै तथा खुजली के रोग को दूर करती है।इसकेपत्तों को तेजपत्ता कहते है |दालचीनी के इतने लाभ है की रोज़ ही चाय में या ऐसे हीगर्म पानी से इसका चूर्ण ले लेना चाहिए.इसका चूर्ण घर में रखना चाहिए .
- पालक ठण्डा होता है। पालक में दालचीनी डालने से इसकी ठण्डी प्रकृति बदल जाती है। इसी प्रकार दूसरे ठण्डे पदार्थों की प्रकृति बदल जाती है। इसी प्रकार अन्यशीतल पदार्थों की प्रकृति दालचीनी डालकर बदल सकते हैं।
- यह गर्भवती स्त्री के लिए हानिकारक होती है। गर्भवती स्त्रियों को इसे नहीं लेना चाहिए अथवा कम मात्रा में लेना चाहिए।
- दालचीनी का तेल दर्द, घावों और सूजन को नष्ट करता है। सिर दर्द के लिए यह बहुत ही गुणकारी औषधि होती है।दालचीनी का तेल 1से 4 बूंद तक काम में लेते हैं। दालचीनी का तेल तीक्ष्ण और उग्र होता है। इसलिएइसे आंखों के पास न लगाएं।
- दालचीनी त्वचा के लिये कंडीशनर का कामकरता है। चेहरे पर दालचीनी शहद का पैक लगाये झुर्रियां नही पड़ेगी।
- दालचीनी के लिए वसाब्लॉक की क्षमता है. शरीर में पर्याप्त दालचीनी के साथ, वसा कोशिकाओं को आसानी से नहीं विकसित होगी.दालचीनी के लिएएक वजन घटाने inducer माना जा रहा है क्योंकि यह मुख्य रूप से पाचन तंत्र पर एक सफाई प्रभाव है.
- मसाले बैक्टीरिया, कवक हटाने में मदद कर सकते हैं और पेट और आंतों से परजीवी. इसलिए, खाना बेहतर है .दालचीनी उदार रोगों , अतिसार , ग्रहणी , अफारे ,दस्त,कब्ज , भूख ना लगना,वमन ,पेट दर्द आदि में लाभकारी है .
- दालचीनी में शरीर की रक्त शर्करा के स्तर को कम करने की क्षमता है, जबकि इंसुलिन के उत्पादन में वृद्धि. जब एक नियमित आधार पर एक मधुमेह रोगियों द्वारा लिया,जाए दालचीनी में इंसुलिन जैसे गुण है.यह मसाला इतना शक्तिशाली है कि यह वास्तव में इंसुलिन के लिए एक सस्ता विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. यह सबसे अधिक प्रकार द्वितीय मधुमेह से पीड़ित लोगों के लिएप्रभावी है. दालचीनीजैव सक्रिय घटक है कि यहाँ तक कि इस रोगकी शुरुआत को रोका जा सकता है.
- दालचीनी ट्राइग्लिसराइड् स को भी कम करती है और शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल का स्तर.भी कम करती है .
-गरम जैतून के तेल में एक चम्मच शहद और एक चम्मच दालचीनी कापावडर दाल कर पेस्ट बनाएं और बालों में लगाए . एक घंटे बाद सरधो ले . इससे बाल झडनारुक जायेंगे .
- इसका सेवन रोगप्रतिरोधक शक्तिऔर आयु को बढाता है .
- दालचीनी का छोटा टुकडा रोजाना सुबह चबाने से हकलाने मेंलाभ होता है .
- संधिवात में दालचीनी के काढ़े कासेवन करने से लाभ होता है .दालचीनी के चूर्ण को शहद में मिलाकर कर लगाने से दर्द में आराम मिलताहै .
- दालचीनी का तेल या इसका लेप या तेजपत्ते के पत्तों को पीस कर बनाए गए लेप से सर दर्द में आराम मिलता है . —